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भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद

(पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त निकाय, भारत सरकार )
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वन आधारित आजीविका एवं विस्तार केंद्र, अगरतला
 

यह केंद्र जुलाई 2012 को भारत सरकार, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के स्वायत निकाय भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद्, देहरादून के अधीनस्थ संस्थान वर्षा वन अनुसंधान संस्थान, जोरहाट के एकक के रूप में अस्तित्व में आया। भा.वा.अ.शि.प द्वारा देश के विभिन्न भागों में स्थित नौ संस्थानों और चार केंद्रों में सबसे नया है। यह उत्तरपूर्वी क्षेत्र में स्थित आर.एफ.आर.आई, जोरहाट के दो केंद्रों में से एक है। दूसरा केंद्र ए.आर.सी.बी.आर, आइजाॅल है।

क्षेत्रीय निदेशक का संदेश

पवन के. कौशिक

मुझे वन आधारित आजीविका एवं विस्तार केंद्र, अगरतला का आधिकारिक वेबपेज प्रस्तुत करते हुये प्रसन्नता हो रही है। केंद्र का प्रयास विभिन्न हितधारकों तथा उपभोक्ता निकायों, गैर सरकारी संगठनों, अनुसंधान संगठनों, त्रिपुरा सरकार के वन विभाग और विशेषकर जनता के साथ मिलकर, लक्षित समुदायों के लिए वन आधारित आजीविका की तकनीकों का विस्तार करना है।

मुझे आशा है कि इस वेबपेज में दी गई सूचनायें दर्शकों के लिए सहायक सिद्ध होंगी। वेबसाईट में सुधार के लिए दिये गये सुझावों का स्वागत है।

सी.एफ.एल.ई की स्थापना क्षेत्र में अनुसंधान एवं विस्तार की आवश्यकताओं की पूर्ति करना है, खासकर त्रिपुरा राज्य के लिए जो मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्र में, जिसके भौगोलिक क्षेत्र का केवल 10 प्रतिशत से भी कम भाग मैदानी है। राज्य में 19 जनजातियों की अधिकांश आबादी निवास करती हैं जो राज्य की कुल आबादी का 30 प्रतिशत है और अपनी आजीविका के लिए वनों पर आश्रित है। ये समुदाय, वनों के आसपास रहते हैं और अपनी आजीविका समन्वित गतिविधियां यथाः खाद्य संग्रह, आवास, चारा और स्वास्थ्य आदि संचालित करते हैं। त्रिपुरा में सी.एफ.एल.ई की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सतत् आजीविका के विकल्प तैयार करते हुये प्रौद्योगिकी के साथ-साथ विज्ञान को समाज के साथ जोड़ना है। केंद्र का उद्देश्य, वन जैवविविधता का संरक्षण करना तथा वन आधारित सतत् जीविकोपार्जन क्रिया-कलापों का प्रख्यापन करना है।

उपर्युक्त प्रारंभिक अधिदेश को प्राप्त करने के लिए केंद्र ने प्रशिक्षण एवं कार्यक्षेत्रीय प्रदर्शनों के जरिये वन आधारित समुदायों के समग्र विकास हेतु कार्यक्रमों की शुरूआत की है। केंद्र का उद्देश्य प्रौद्योगिकी का विस्तार प्रयोगशाला में कृषि भूमियों तक करना है। साथ ही प्रौद्योगिकी को अपनाने पर हुये प्रभावों को समझना और सहभागिता अनुसंधान द्वारा व्यवहारिक कार्यक्षेत्रीय अनुभव का प्रसार करना है।

 

सी.एफ.एल.ई अधिदेश

  1. वन आधारित आजीविका विकास
  2. बांस क्षेत्र प्रौद्योगिकी विकास एवं विस्तार
  3. कृषि वानिकी विकास
  4. जैवविविधता आकलन
  5. प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन एवं उपयोजन के समाघात का आकलन करना

 

केंद्र के उद्देश्य एवं ध्येय-

  1. वानिकी तकनीकों के अनुप्रयोग में सतत आजीविका विकल्पों का अनुरक्षण करना।
  2. मूल्य वृद्धि के साथ-साथ बांस क्षेत्र के समग्र विकास में सहायता करना.
  3. खेतों में सहभागिता अनुसंधान के जरीये समाज के लाभ के लिए वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा देना।
  4. प्रशिक्षण तथा प्रदर्शन के जरिये उपयुक्त प्रौद्योगिकी पैकेज का प्रभावशाली विस्तार करना।
  5. जैवविविधता संरक्षण के लिए हितधारकों में जागरूकता पैदा करना

क्रिया-कलापों पर एक नजर

(मार्च 2016 के अनुसार)

डायरेक्ट टू कन्ज्यूमर कार्यक्रम

  1. त्रिपुरा में झाडू-घास की खेती पद्धतियों का परिचय
  2. झाडू घास आधारित कृषि वानिकी का विस्तार
  3. सामुदायिक जीविकोपार्जन पौधशालाओं के तहत बांस के व्यापक प्रसार हेतु संक्रियात्मक सहभागिता प्रकिया।
  4. वर्मी कम्पोस्टिंग के लिए बांस की कम लागत वाली एककों को लोकप्रिय बनाना।
  5. अन्तः फसलों के साथ मस्कदाना खेती का परिचय
  6. कम लागत के बांस उपचार टैंक तथा बांस उपचार मशीनों को लोकप्रिय बनाना
  7. बांस पिण्ड प्रबंधन का विस्तार।

खेती में सहभागिता परीक्षण

  1. महत्वपूर्ण बांस प्रजातियों के प्रसार हेतु हर्बल गार्डन, कंचनपुर में वनीय औषधीय पादपों का घरेलूकरण
  2. बांस के खाद्य तनों का उत्पादन परीक्षण
  3. शबारी बनाना- लाकडोंग हल्दी अन्तःफसल
  4. कनक कैच - लाकडोंग हल्दी बांस कृषि वानिकी।

सहयोगात्मक कार्य/हितधारकों को तकनीकी सहायता

  1. एन.सी.ई. के मासिक न्यूजलेटर मंजरी के प्रकाशन में तकनीकी सहयोग
  2. परम्परागत औषधियों’ पर स्थानीय तथा राष्ट्रीय कार्यशालाओं के आयोजन हेतु एम.पी.बी.टी. की योजना तथा तकनीकी सहयोग
  3. एन.टी.पी.टी.-पी.आर.यू.टी. की स्थापना के लिए अवधारणा टिप्पणी तैयार करना।
  4. एन.सी.ई. में जी.आई तथा डिजिटल वनस्पति संग्रहालय पर अन्तःक्रिया कार्यशाला आयोजित करने हेतु तकनीकी सहायता देना।
  5. त्रिपुरा विश्वविद्यालय को कार्य आवंटित करने में पर्यवीक्षण करना।
  6. बांस क्यू.पी.एम. की आपूर्ति हेतु त्रिपुरा बांस मिशन के साथ तारतम्य बनाना।
  7. अन्य संबद्ध विभागों के प्रशिक्षणार्थियों के ज्ञान का आदान-प्रदान करना तथा परिसरीय दौरों का आयोजन करना।

राज्य स्तरीय समितियों में सी.एफ.एल.ई. की उपस्थिति

  1. सम्पादक मण्डल, मंजरी(एन.टी.एफ.पी., एन.सी.ई. त्रिपुरा का न्यूजलैटर)
  2. एन.सी.ई. त्रिपुरा- जे.आई.सी.ए परियोजना को तकनीकी सलाह देना।
  3. पारम्परिक औषधि-व्यवसाइयों की राज्य परिषद की सदस्यता
  4. राज्य स्तरीय पर्यावरणीय समाघात आकलन प्राधिकरण की सदस्यता
  5. औषधीय पादप राष्ट्रीय मिशन के तहत राज्य स्तरीय विश्लेषण समिति की सदस्यता
  6. राज्य स्तरीय परामर्शी समिति की सदस्यता (राष्ट्रीय कार्ययोजना कोड-2014 के तहत)
  7. राज्य वन्यजीव बोर्ड की सदस्यता
  8. त्रिपुरा कविराज संघ -परम्परागत चिकित्सकों के लिए त्रिपुरा सरकार द्वारा गठित राज्य स्तरीय निकाय, की सदस्यता

 

 

तकनीकी प्रबंधन एवं प्रशिक्षण

  1. बांस विस्तार प्रौद्योगिकियां
  2. कम लागत की वर्मी कम्पोस्ट तकनीकें
  3. कृषि वानिकी तकनीकें
  4. बांस उपचार तकनीकें, उपचारित बांस के निष्पादकता परीक्षण
  5. पिण्ड प्रबंधन तकनीकें
  6. बांस हस्तशिल्प में कौशल उन्नयन
  7. मधुमक्खी पालन तकनीकें
  8. जैव कीटनाशक एवं कार्यक्षेत्रीय अनुप्रयोग

सामान्य विस्तार कार्यक्रम

  1. निम्नलिखित का आयोजन करना:- विश्व वानिकी दिवस, विश्व बांस दिवस, जीव विज्ञानीय वैविध्य पर अन्तर्राष्ट्रीय दिवस, विश्व पर्यावरण दिवस
  2. मेलों में भाग लेनाः- पर्णसमूह प्रदर्शन (बांस तथा पर्णांग) व्यापार मेला आदि
  3. बंास प्रसार पर किसानों द्वारा किसानों को प्रशिक्षित करना।

स्थानिक (आॅन- स्टेशन) क्रियाकलाप

  1. बांस क्यू.पी.एम. पौधशाला की स्थापना (क्षमता - 10,000 पौधे, 17 प्रजाति 2012 से आगे)
  2. आजीविका वानिकी पौधशाला की स्थापना (क्षमता- 40,000 पादप, 12 प्रजाति 2012-15)
  3. बरक (बम्बूसा बालकुआ) प्रकन्द बहुगुणन गार्डन आर.एम.जी. (ऊतक संवृद्धि पादप)
  4. फ्लेमिंजिया रोपण (एफ. मैक्रोफेला तथा एफ. सेमीअलाटा) तथा लाख संचारण परीक्षण
  5. विभिन्न जैव परिरक्षकों तथा रासायनिक उपचारों के तहत बांस का समाधि क्षेत्र (ग्रेवयार्ड) परीक्षण

सर्वेक्षण तथा मूल्यांकन आवंटन

  1. पुष्पनोपरांत परिदृश्य में मुली परियोजना
  2. वन सीमावर्ती गावों का सर्वेक्षण -एन.आर.ए.ए- त्रिपुरा
  3. वन किस्मों के पुनरावलोकन के तहत कार्यक्षेत्रीय सर्वेक्षण (त्रिपुरा)
  4. त्रिपुरा में एन.ए.पी. मूल्यांकन
  5. त्रिपुरा में नोनी का उद्गम स्थल परीक्षण
  6. त्रिपुरा में कैम्पा का मूल्यांकन

सी.एफ.एल.ई के तहत सामाजिक संगठनों, युवा सोसाइटियों तथा एन.जी.ओ. का नेटवर्क

  1. नोवागांव बांस उत्पादक सोसाइटी
  2. मार्स सोसियो वेलफेयर सोसाइटी
  3. वैद्यराज हर्बल उत्पादकों की सोसाइटी
  4. बांस स्वयंसेवक, कंचनपुर
  5. त्रिपुरा बांस और बेंत विकास केंद्र
  6. हिमालय परिवार, त्रिपुरा
  7. ग्रामीण सुधार एवं अनुसंधान पर लोगों की सहमति (परिवार), त्रिपुरा
  8. एफ.ए.एस.ए.एल उत्पादक वर्ग-एम.ए.एस.कृषि रसायन (वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन तथा विपणन)
  9. दुइया स्मारक सोसाइटी, बोधजंग नगर
  10. सेंट अंद्रे माइनर सेमीनेरी, बोधजंग नगर
  11. पर्वा सतनाला कृषक क्लब
  12. ग्रामीण आजीविका के लिए संगठन, बेलोनिया
  13. अनन्य एस.एच.जी, अमताली, अगरतला
  14. सीमांत हस्तशिल्प एवं उत्पादन लिमिटेड
  15. नवजागरण हस्तशिल्प (एस.एच.जी.)
  16. पंचायी कृषक क्लब

अनुसंधान परियोजनाओं का विवरण

जारी परियोजनों के नाम वर्तमान स्थिति
1. त्रिपुरा (भा.वा.अ.शि.प. के तहत) मेलोकेन्बेसीफेरा के पुष्पन के उपरान्त पुनरूत्पति का अध्ययन।

त्रिपुरा में मेलोकेन्बेसीफेरा के वृहत पुष्पन के कारण बड़े पैमाने पर क्षति के बाद प्राकृतिक पुनरूत्पति हुई। पुनरूत्पति का आकलन करने के लिए आर.एफ.आर.आई. में पी.आई. के परामर्श से कार्यक्षेत्रीय क्रियाकलाप सम्पन्न किये गये। व्यापक सर्वेक्षण द्वारा 42 स्थानों सेे डाटा एकत्र करके स्तरित नमूने लिये गये। त्रिपुरा के सभी भागों में चतुष्कोणक बनाकर प्राकृतिक समूहों की प्राकृतिक स्थिति का आकलन किया गया जिसके बाद व्यापक सर्वेक्षण किये गये। डाटा को तालिकाबद्ध किया गया और अन्तिम रिपोर्ट तैयार की जा रही है।

2. वन सीमा पर बसे गावों के पास वन भूमियों के विस्तार की पहचान एन.आर.ए.ए. परियोजना (त्रिपुरा)

पूरे त्रिपुरा में एक सौ गावों का सर्वेक्षण किया गया। भा.वा.अ.शि.प. द्वारा एन.आर.ए.ए. को रिपोर्ट जा रही है।

3. मेरिन्डा साइट्रोफोलिया एल. (नोनी) - एन.एम.पी.बी. के तहत उत्तर-पूर्वी भारत के लोगों के लिए जीविकापार्जन के विकल्प

परियोजना का क्रियान्वयन आर.एफ.आर.आई में किया जा रहा है। कार्यक्षेत्रीय परीक्षणों का अनुरक्षण एवं अनुवीक्षण, त्रिपुरा के हैतीपारा में सी.एल.ई. के कार्यक्षेत्रीय सहयोग में मेरिन्डा साइट्रोफोलिया एल. (नोनी) के पौधों को अभिकल्प के अनुसार रोपित किया जा रहा है। कार्य क्षेत्रीय परीक्षणों को नियमित रूप से माॅनीटर किया जा रहा है।

4. त्रिपुरा में ’उपभोक्ताओं तक सीधी पहुँच’ योजना के तहत ऐली क्रोपिंग में फ्लेमिंजिया प्रजाति में जीवोकोपार्जन क्षमता का मूल्यांकन

राज्य वन विभाग के सहयोग से फ्लेमिंजिया प्रजाति को लाख संवृद्धि के प्रख्यापन हेतु सामने लाया गया।

5. त्रिपुरा में कैम्पा क्रिया कलापों का मूल्यांकन जारी है

विस्तार क्रिया-कलाप:

1. त्रिपुरा के ग्रामीण क्षेत्रों में कम लागत के बांस उपचार को लोकप्रिय बनाना:

सी.एफ.एल.ई ने बांस उपचार तकनीकों एवं बांस परिक्षण प्रक्रियाओं पर करीब 15 प्रशिक्षण आयोजित किये हैं, जिनमें पूरे त्रिपुरा राज्य से 360 भागीदार शामिल हुये। ये प्रशिक्षण, बमूतिया,नोआगांव, बोर्जस, खस्कोमुहानी, कंचनपुर तथा अगरतला में आयोजित किये गये। राज्य के विभिन्न भागों में कई वर्गों द्वारा बोचरी मशीन को अपनाया गया है। ये मशीनें निरंतर प्रयोग में लाई जा रही है और उपभोक्ताओं को इस तकनीक से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ हो रहा है।

बोचरी मशीनों तथा बांस उपचार टैंक्स का उपयोग–

  1. मार्स सामाजिक कल्याण सोसाइटी (एम.एस.डब्लयू.एस.), कंचनपुर
  2. नोवागाँव बाँस उत्पादक सोसाइटी (एन.बी.जी.एस.), नोवागाँव
  3. नीरमहल शिल्प, खासकाउमुनी
  4. नव जागरण एस.एच.जी., नलछार
  5. डिशारी एन.जी.ओ., बिलोनिया
  6. ट्राईबैक, अगरतला
  7. मिथाई बांस फर्नीचर वर्ग, कलीबाजार (द्वारा एन.बी.जी.एस.)
  8. अनन्य एस.एच.जी।

फर्नीचर, हस्तशिल्प तथा गहने बनाने वालों में यह लोकप्रिय है। कुछ वर्गों ने इस तकनीक को घर तथा अन्य संरचनाओं में किया है।

 

सी.एफ.एल.ई के तहत बांस उपचार केंद्र

 

सी.एफ.एल.ई के तहत बांस उपचार केंद्र ने राज्य के विभिन्न स्थलों में छोटे पैमाने के बांस उपचार तथा तकनीकी प्रदर्शन केंद्र स्थापित किए गए हैं, जो इस प्रकार हैः-

  1. बांस उपचार एवं प्रदर्शन केंद्र, गांधीग्राम (टी.आर.आई.बी.ए.सी. के सहयोग से)
  2. बांस उपचार केंद्र, कंचनपुर (एम.एस.डब्लयू.एम. के सहयोग से)
  3. बांस उपचार केंद्र, नोवागाँव
  4. बांस उपचार केंद्र, खास्कोमुहान

 

बांस उपचार तकनीकों का वाणिज्यीकरण तथा ठेकेदारी प्रथा का विकास -

 

हाल ही में, अगरतला, त्रिपुरा में समाज आधारित उद्यम के तहत त्रिपुरा बांस एवं बंेत विकास केंद्र (टी.आर.आई.बी.ए.सी.) ने बोचरी मशीन से न्यूनतम पूंजी परिव्यय के जरीये कम लागत के उपचार टैंकों में रसायनों के साथ शुरूआती कच्ची सामग्री पर उपचारित बांस उत्पादन एकक स्थापित करने की शुरूआत की। टी.आर.आई.बी.ए.सी ने वन आधारित आजीविका एवं विस्तार केंद्र (सी.एफ.एल.ई.), अगरतला के तकनीकी सहयोग से वाणिज्यिक उपयोग की विभिन्न उपजाति बांस प्रजातियों की ‘ट्राई बाम’ ब्रांड बनाने में सफलता प्राप्त की। सी.एफ.एल.ई. के सहयोग से टी.आर.आई. बी.ए.सी. द्वारा नए उद्यमियों की क्षमता वृद्धि के लिए प्रशिक्षण एवं प्रदर्शनियों का आयोजन किया जा रहा है और साथ ही गृह-निर्माण, फर्नीचर तथा घरेलू बाड़ के लिए उपचारित बांस का विपणन किया जा रहा है। टी.आर.आई.बी.ए.सी. द्वारा बिहार, मेघालय और त्रिपुरा में प्रोटोटाईप बांस उपचार मशीन का विस्तार भी किया गया है। भवन निर्माण और बाड़ बनाने में उपचारित बांस उत्पादन हेतु गरीबों के लिए त्रिपुरा के ग्रामीण इलाकों जैसे कंचनपुर, मेलाघर तथा बमूतिया में उपयुक्त बांस तकनीकों का विस्तार किया गया है। इसके अलावा भूकंप संवेदी क्षेत्रों में आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए इन्दिरा आवास योजना के तहत ग्रामीण गरीबों के लिए स्तरीय बांस निर्माण घटकों की आपूर्ति करके वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराई जा सकेगी।

आशा की जाती है कि जागरूकता पैदा करने और ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में सामुदायिक उद्यम विकास से निकट भविष्य में उपचारित बांस की मांग बढे़गी और साथ ही संसाधनों की खपत भी कम होगी। इसलिए सी.एफ.एल.ई. द्वारा स्थानीय गैर सरकारी संगठनों और विभिन्न स्वैच्छिक वर्गों के सहयोग से इस योजना को उन क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास किया जो अभी तक इस योजना की पहुंच से बाहर हंै।

2. कम लागत की वर्मी कम्पोस्टिंग तकनीकें

पश्चिमी तथा उत्तरी त्रिपुरा में लाभार्थियों द्वारा उत्पादित वर्मी कम्पोस्ट की बिक्री से आजीविका बढ़ाने के लिए बाजार से तारतम्य विकसित किया गया।

स्थानीय युवकों को कम लागत की वर्मी कम्पोस्ट तकनीकों की उच्च आय क्षमता के प्रति प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये युवक वर्मी कम्पोस्ट एककों को वाणिज्यिक उपयोग के लिए स्थापित करने हेतु आगे आ रहे हैं। उत्पादक वर्ग स्थापित करके सी.एल.एल.ई. द्वारा बमूतिया और कंचनपुर में कई वर्मी कम्पोस्ट एककें स्थापित की गई हैं। उत्पादन को एकत्र करने और ‘फसल’ के ब्रान्ड नाम से विपणन के लिए अगरतला में एम.ए.एस. कृषि रसायन आधारित उत्पाद को वर्मी कम्पोस्ट का उत्पाद करने वाले किसानों में लोकप्रिय बनाया जा रहा है।
आॅर्गेनिक खेती के लिए निकाय द्वारा वर्मी कम्पोस्ट की आपूर्ति हेतु विभिन्न रोपण निकायों के साथ अनुबंध किया गया है।

3. झूम क्षेत्रों में बीजों का श्रेणीकरण

झूम क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए सी.एफ.एल.ई. ने बोने से पहले बीज के श्रेणीकरण की जांच हेतु पंाच अवस्थितियां चयनित की हंै यथाः अम्बासा, कंचनपुर ,सब्रूम, जाम्पुई की पहाड़ियां और सुबल सिंह।

4. बांस पौधशालाओं का उन्नयन:

बांस उत्पादक सामग्री की बढ़ती हुई मांग को देखते हुये सी.एफ.एल.ई. द्वारा कंचनपुर मंे बांस पौधशाला का उन्नयन किया जा रहा है। बांस के पौधों को उगाने तथा रोपण निकायों जैसे राज्य बांस मिशन या वन विभाग को आपूर्ति करने हेतु करीब 300 युवकों को कार्य पर लगाया गया है।

5. औषधीय बगीचों का उन्नयन:

सी.एफ.एल.ई. द्वारा उत्तरी त्रिपुरा में 10 औषधीय बगीचे तैयार करने हेतु कंचनपुर में 55 जनजातीय वैद्यों को वैद्यराज औषधीय जड़ी उत्पादक सोसाईटी स्थापित करने में सहयोग किया गया हैै। सोसाइटी की योजना ज्ञान आधार और कम से कम 500 औषधीय पादपों का बैंक स्थापित करने की है।

 

सम्पर्कः:

नाम

पद दूरभाष-कार्यालय मोबाइल. ई-मेलl Address

पवन के. कौशिक

क्षेत्रीय निदेशक

+91-3812397097

+91-9402140041

rd_cfle@icfre.org

pawan.kaushik@gmail.com

वन आधारित आजीविका एवं विस्तार केंद्र, अगरतला
शाल बागान वन परिसर,
गांधी ग्राम, अगरतला, त्रिपुरा-799 012

 

 

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